हाना (छत्तीसगढ़ी कहावत)
5 min read 920 words 67 views

हाना (कहावत) ल विश्व के निति- साहित्य के अंग माने जाथे। हाना अपन आप म पुरा होथे – जइसे ‘अंधरा म कनवा राजा। हाना मन के स्वतंत्र प्रयोग होथे। हाना मन के उद्देश्य टोर-मड़ोर या तर्क ले कोनो गोठ ल साबित करई या तो ओकर विरोध करइ। काल वचन अउ पुरूष के ले येमा कोनो परिवर्तन नई होवय। छत्तीसगढ़ी म कहावत बर ‘हाना’ शब्द प्रचलित हे। येकर अर्थ घलो ह कहई या कथन हरय। अँग्रेजी म येकर बर ‘वेलशेड’ अउ संस्कृत म सुभाषित ‘शब्द प्रचलित हावय।

क्रमांकहाना (कहावत)अर्थ
१.धान अउ बाम्हन के एके हाल।धान अउ बाम्हन मन म अलग अलग भेद होथे।
(धान और ब्राम्हण में अनेक भेद होथे है।)
२.आदमी म नउवा अउ चिरई म कऊआँ।आदमी म नाई अउ पक्षि मन म कउआ ह चलाक होथे।
(मनुष्य में नाई और पक्षियों में कौवा चतुर होते है।)
३.उल्टा पुल्टा भए संसार, नाऊ के मुंड़ ल मूड़े लुहार।जमाना बदल गे हावय,धारा ह उल्टा हे।
(जमाना बदल गया है, धारा विपरीत है।)
४.गदहा सुर न बगुला जती बनिया मित्र न वेश्या सती।गदर्भ म सुर मधुर नई होये, अउ न बगुला साधु होवय, उहि प्रकार ले न बनिया ह शुभचिंतक संगी नई हो सकय, अउ न वेश्या म सतीत्व।
(गदर्भ में स्वर माधुर्य नही होता , न बगुला साधु होता है,उसी प्रकार न बनिया शुभचिंतक मित्र होता है, न वेश्या में सतीत्व होता है।)
५.ठलहा बनिया का करय,ए कोठी के धान ल वो कोठी मा धरय।निठल्ला बिन काम काज के रहिथे।
(निठल्ला अनावश्यक कार्य मे लिप्त रहता हैं।)
६.बाप के बानी पठान के घोड़ा,बहुत निहि तो थोड़ा-थोड़ा।खानदानी स्वभाव ह आदमी अउ पशु मन म थोरकन समानता रहिथे।(खानदानी स्वाभाव मनुष्य और पशुओं में थोड़ा- बहुत समानता रहता है।)
७.बढ़ई के डउकी भुइँया म सुतय।सुविधा होये के बाद घलो कमती होना।
(उपलब्धता में भी अभाव का होना ।)
८.अड़हा के लेखे रड़हे रड़हा।अनपढ़ बर सबो अक्षर बराबर हे।
(अशिक्षित के लिए सब अक्षर बराबर है।)
९.अपने टेंटा ल देखय नहीं, आन के फुला ल हाँसथय।अपन गलती नई दिखय, अउ दुसर के ह जल्दी दिख जाथे।
(अपना दोष दिखाई नही देता, दुसरे का जल्दी दिख जाता है।)
१०.अपन मरे बिन सरग नइ दिखय।जरूरी काम ह खुद करे बिना सिद्ध नई परय।
(महत्वपूर्ण कार्य स्वयं के बगैर सम्पादित नही होते।)
११.ऊना-ऊना गाँव व कानी मुटियानी।अंधवा म कनवा राजा।
(अंधे में काना राजा ।)
१२.एक तो करेला करू, ऊपर ले नीम चढ़े।पहली ले बिगड़े काम अउ बिगड़ जाथें।
(पूर्व से ही स्तरहीन का और बिगड़ जाना।)
१३.कनखुजरा के एक गोड़ टूटे ले कुछु नई होय।छोटे मोटे नुकसान ले सेठ आदमी मन के कुछु नई बिगड़य।
(छोटी मोटी हानि से धनी व्यक्ति का कुछ नही बिगड़ता।)
१४.करनी दिखय मरनी के बेर।करम के फल ह मरे के बेरा म दिखथे।
(कर्म का प्रतिफल मृत्यु के समय दिखता है।)
१५.कुकुर के पुंछ जब रही त टेड़गा।आदमी अपन आदत नई छोड़ पावय।
(व्यक्ति अपनी प्रवुति नहीं छोड़ पाता।)
१६.गाँव के जोगी जोगड़ा, आन गाँव के सिद्ध।अपन गाँव म बाहर ले आये आदमी मन के बहुत सम्मान होथे,अउ अपनेच गाँव म सिद्ध मनखे ल घलो सम्मान नई मिलय।
(अपने गाँव मे बाहरी लोग अधिक प्रतिष्ठा पाते है, अपने गाँव मे तो सिद्ध भी प्रतिष्ठा नहीं पाता।)

Leave A Comment

Get Certificate

Get Quality Skills Certificate From the EduAll

Get Started Now
img