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हाना (कहावत) ल विश्व के निति- साहित्य के अंग माने जाथे। हाना अपन आप म पुरा होथे – जइसे ‘अंधरा म कनवा राजा। हाना मन के स्वतंत्र प्रयोग होथे। हाना मन के उद्देश्य टोर-मड़ोर या तर्क ले कोनो गोठ ल साबित करई या तो ओकर विरोध करइ। काल वचन अउ पुरूष के ले येमा कोनो परिवर्तन नई होवय। छत्तीसगढ़ी म कहावत बर ‘हाना’ शब्द प्रचलित हे। येकर अर्थ घलो ह कहई या कथन हरय। अँग्रेजी म येकर बर ‘वेलशेड’ अउ संस्कृत म सुभाषित ‘शब्द प्रचलित हावय।
| क्रमांक | हाना (कहावत) | अर्थ |
| १. | धान अउ बाम्हन के एके हाल। | धान अउ बाम्हन मन म अलग अलग भेद होथे। (धान और ब्राम्हण में अनेक भेद होथे है।) |
| २. | आदमी म नउवा अउ चिरई म कऊआँ। | आदमी म नाई अउ पक्षि मन म कउआ ह चलाक होथे। (मनुष्य में नाई और पक्षियों में कौवा चतुर होते है।) |
| ३. | उल्टा पुल्टा भए संसार, नाऊ के मुंड़ ल मूड़े लुहार। | जमाना बदल गे हावय,धारा ह उल्टा हे। (जमाना बदल गया है, धारा विपरीत है।) |
| ४. | गदहा सुर न बगुला जती बनिया मित्र न वेश्या सती। | गदर्भ म सुर मधुर नई होये, अउ न बगुला साधु होवय, उहि प्रकार ले न बनिया ह शुभचिंतक संगी नई हो सकय, अउ न वेश्या म सतीत्व। (गदर्भ में स्वर माधुर्य नही होता , न बगुला साधु होता है,उसी प्रकार न बनिया शुभचिंतक मित्र होता है, न वेश्या में सतीत्व होता है।) |
| ५. | ठलहा बनिया का करय,ए कोठी के धान ल वो कोठी मा धरय। | निठल्ला बिन काम काज के रहिथे। (निठल्ला अनावश्यक कार्य मे लिप्त रहता हैं।) |
| ६. | बाप के बानी पठान के घोड़ा,बहुत निहि तो थोड़ा-थोड़ा। | खानदानी स्वभाव ह आदमी अउ पशु मन म थोरकन समानता रहिथे।(खानदानी स्वाभाव मनुष्य और पशुओं में थोड़ा- बहुत समानता रहता है।) |
| ७. | बढ़ई के डउकी भुइँया म सुतय। | सुविधा होये के बाद घलो कमती होना। (उपलब्धता में भी अभाव का होना ।) |
| ८. | अड़हा के लेखे रड़हे रड़हा। | अनपढ़ बर सबो अक्षर बराबर हे। (अशिक्षित के लिए सब अक्षर बराबर है।) |
| ९. | अपने टेंटा ल देखय नहीं, आन के फुला ल हाँसथय। | अपन गलती नई दिखय, अउ दुसर के ह जल्दी दिख जाथे। (अपना दोष दिखाई नही देता, दुसरे का जल्दी दिख जाता है।) |
| १०. | अपन मरे बिन सरग नइ दिखय। | जरूरी काम ह खुद करे बिना सिद्ध नई परय। (महत्वपूर्ण कार्य स्वयं के बगैर सम्पादित नही होते।) |
| ११. | ऊना-ऊना गाँव व कानी मुटियानी। | अंधवा म कनवा राजा। (अंधे में काना राजा ।) |
| १२. | एक तो करेला करू, ऊपर ले नीम चढ़े। | पहली ले बिगड़े काम अउ बिगड़ जाथें। (पूर्व से ही स्तरहीन का और बिगड़ जाना।) |
| १३. | कनखुजरा के एक गोड़ टूटे ले कुछु नई होय। | छोटे मोटे नुकसान ले सेठ आदमी मन के कुछु नई बिगड़य। (छोटी मोटी हानि से धनी व्यक्ति का कुछ नही बिगड़ता।) |
| १४. | करनी दिखय मरनी के बेर। | करम के फल ह मरे के बेरा म दिखथे। (कर्म का प्रतिफल मृत्यु के समय दिखता है।) |
| १५. | कुकुर के पुंछ जब रही त टेड़गा। | आदमी अपन आदत नई छोड़ पावय। (व्यक्ति अपनी प्रवुति नहीं छोड़ पाता।) |
| १६. | गाँव के जोगी जोगड़ा, आन गाँव के सिद्ध। | अपन गाँव म बाहर ले आये आदमी मन के बहुत सम्मान होथे,अउ अपनेच गाँव म सिद्ध मनखे ल घलो सम्मान नई मिलय। (अपने गाँव मे बाहरी लोग अधिक प्रतिष्ठा पाते है, अपने गाँव मे तो सिद्ध भी प्रतिष्ठा नहीं पाता।) |