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श्रीमती शोभामोहन श्रीवास्तव जी के छत्तीसगढ़ी गुरतुर जनउला
1. सटर पटर लाम डोर। तीन मुड़ी दस गोड़।।
2. चाँदी जइसे जगमग, बीच हे दूफँक्का। जेन नइ जानै, हम ओकर अन कक्का।
3. हाथ गोड़ लकड़ी के पेट हवय खदहा। जेन येला नइ बूझै ओकर बाप गदहा।
4. फरे ना फूलै, गहदाये नार।
5. जर हे न पत्ता, लपटे अकड़धत्ता।
6. चाल चलै रूनझुन, बइठे में थक्का । दू कोरी ले आगर गोड़, अउ ओतके बच्चा।
7. खेत में उपजै, हाट बिकाय, साधू ब्राह्मण सब झन खाय।
नाम बतावत आथे हस्सी, आधा गदहा, आधा खस्सी।
8. हमरो राजा के अनगिनती गाय। रात चरै दिन में छुप जाय।
9. एक गाँठ मनमोहन नाम। बारा डारा, बारा नाम।
10. एक चिरैया ऐसनी, खुटा ऊपर बैसनी।
दाना खवै कुचुर-मुचुर, अइसे चिड़ियाँ कैसनी।
11. सूजी असन सोझहा, माथा ऊपर बोजहा।
12. तन मोर हरियर जनम जहरा, बुढ़ौती म पहिरौ लाली के घंघरा।
13. जबतक रहेंव छेलाकुमारी, तब तक सहेंव मार।
पहिन डरेंव अब लाल घंघरिया, अब न सहौं झन मार।
14. कारी गइया घुमरे दरबर। दूध निथारे छरछर छरछर।
15. टिप-टिप टपकथे, कपार वोकरे कुचरे। रसभरी गोरीपरी रातभर बुलथे।
16. तन निचट लिड़िगलाड़ग, बड़ेक जान पुछड़ी।
17. नानचुन मुसरी, पहाड़ भीतर घुसरी।
18. जब मैं रहौं क्वारीबारी। तब मैं पहिरौ दुहरी सारी।।
जब मैं होवौ अटलजवान। साड़ी फाड़ै लोग-लुगान।
19. ऐती लद्दी, ओती लद्दी, बीच झलरझैया। फर फरे लदलद ले, खाब में मिठैया।
20. चार कबूतर चार रंग, भाड़ी कूदत एके रंग।
21. डोकरी फोकली नरियर बूच। हम ला देख के दुरिहा घुँच।।
22. जर हे न पत्ता, लपटे अकड़धत्ता
उत्तर:
1- गाय बछरू अउ राउत, 2-दाँत, 3- नाव, 4- पान, 5- अमरलत्ता, 6- रेल, 7- खरबूजा, 8- चाँदनी (तारा), 9- बछर, दिन, तिथि, 10- जाँता, 11-ताड़, 12- मिरचा, 13- हड़िया, 14- बादर (मेघ), 15- मउहा (महुआ), 16- सुई, 17- सुजी (सुई), 18- जोंधरी (भुट्टा), 19- पानी के सिंघाड़ा, 20- पान, 21- अर्थ- वृद्ध लोग हमसे दूर ही रहो हमें तुम्हारी आवश्यकता नहीं है, 22-अमरबेल।
Mohan srivastava poet
09/09/2023छत्तीसगढ़ी भाषा को समृद्ध करने के लिए अनूठा प्रयास।
बृजलाल दावना
09/09/2023बहुत ही सुन्दर सुन्दर जनउला हे दीदी