नानकिन किस्सा (व्यंग)
3 min read 514 words 8 views

नानकिन किस्सा :

दुखी लाल के दुख

का बतावँव‌ मैं, येखर मारे अब्बड़ हलाकान होगेंव। संग ला कभू छोड़े नहीं। जिहाँ जाथे उहें धर के लेगथे। मोला लेगे बर सुरता भुला जाथे।” बिहनिया बेरा ले मालती हा अपन गोसइया दुखी लाल ला बनेच बखानत राहय।
आँखी रमजत दुखी लाल उठिस ता मालती के पारा अउ ऊपर डहर चढ़गे- “ये दे फेर जाही ओखरे तीर मा।”
दुखी लाल किहिस- ‘जाबो नहीं; तोला काय होवत हे। हमर मन, हम कहूँ तीर जावन, कोनो ला घर मा लावन। तोला काय करना हे।”
मालती कहिथे- “हाँ… हाँ… जा… जा । ओखरे संग बिहाव नइ कर लेय रहितेस ? सब ले बड़े दुश्मन आय मोर ओहर। मोर तीर मा झन लाय कर ओला। बाजार, दुकान या फेर घर मा संगी–साथी मन आहीं, तभो ले ओला सबले मिलवाही। जानो-मानो उही तोर बाई हरय। जब ले लवई चालू करे हस, घर मा खर्चा बाढ़त हे। सरकार घलो अइसन मनखे ला कुछू नइ बोलय।” 
वो दिन तो दुखी लाल मालती के बात ला एक कान ले सुनिस, अउ दूसर कान ले निकाल दिस। जब ले दुखी लाल ओखर संग ला धरे रिहिसे, घर मा रोज झगरा मातय। दुखी लाल अपन दुख ला भुलाए बर संग मा ओला राखे ता, मालती अउ बिफर जाय। एँड़ी के रीस तरुवा मा चढ़ जाय।
मालती हा मन मा ठान ले रिहिस की आज ये घर मा या तो ये रही या मेहा। संझा बेर दुखी लाल काम–बूता ले घर आइस। आते साठ मालती दुवारी मा खड़े हो के कहिथे- “आज मैं फैसला कर के रहूँ।” दुखी लाल मालती के गोठ ल सुनते रिहिस की ओकर खिसा ले गुड़ाखू-डब्बा ला निकाल के तुरते घुरवा मा फेंक दिस। बिचारा दुखी लाल गुडा़खू बिना अधूरा रहिगे। आज ओला टंगिया गँवाये अस लागिस। दुवारी मा मुँड़ धर के बइठे दुखी लाल ल अपन नाम ऊपर बड़ दुख लागत राहय।


-लेखिका-
प्रिया देवांगन “प्रियू”
राजिम
जिला – गरियाबंद
छत्तीसगढ़

Leave A Comment

Get Certificate

Get Quality Skills Certificate From the EduAll

Get Started Now
img