कविता

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  • सुन्ना मोर गांँव : प्रिया देवांगन “प्रियू”

                   //सुन्ना मोर गांँव// सुनलव संगी सुनव मितान।देवव थोरिक येती ध्यान।। कलजुग के कर लौ पहिचान। मनखे हावय बड़ परशान।। गिल्ली डंडा फुगड़ी रेल।नइ होवय अब कखरो मेल।। कहाँ लुकागे जम्मों खेल।घर मा खुसरे लगथे जेल।। अब्बड़ सुन्ना लागे खोर।करे नहीं कोनो हर शोर।। राँय राँय के दिन हर आय।गरमी माRead More
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  • धान के महिमा

         //धान के महिमा// पींयर –पींयर धनहा बाली। बिहना पड़थे सूरज लाली।। घाम अगासा के वो सहिथे। धान सोन कस चमकत रहिथे।। चिरई–चिरगुन गाना गाथे। घेरी–बेरी खेत म जाथे।। पक्का–पक्का बीजा पाथे। फोर–फोर के जम्मों खाथे।। किसम–किसम के धान ल बोथे। अब्बड़ पैदावार ह होथे।। चारों मुड़ा सुघर ममहाथे। देख किसनहा खुश हो जाथे।।Read More
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