श्रीमती शोभामोहन श्रीवास्तव जी के छत्तीसगढ़ी गुरतुर जनउला 1. सटर पटर लाम डोर। तीन मुड़ी दस गोड़।। 2. चाँदी जइसे जगमग, बीच हे दूफँक्का। जेन नइ जानै, हम ओकर अन…Read More
हाना (कहावत) ल विश्व के निति- साहित्य के अंग माने जाथे। हाना अपन आप म पुरा होथे – जइसे ‘अंधरा म कनवा राजा। हाना मन के स्वतंत्र प्रयोग होथे। हाना…Read More
1. ‘कोस कोस म पानी बदलै, चार कोस म बानी।’ छत्तीसगढ़ी अर्थ- थोर थोर दुरिहा म पानी के सुवाद ह बदल जाथे – ओकर कुछ दुरिहा जाए ले बोली घलो बदल जाथे। (थोड़े-थोड़े दूर में पानी का स्वाद बदल जाता है-उससे कुछ दूर जाने पर बोली बदल जाती है।) 2. ‘नींदे कोड़े खेती, कोरे गाँथेRead More