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1. ‘कोस कोस म पानी बदलै, चार कोस म बानी।’

छत्तीसगढ़ी अर्थ- थोर थोर दुरिहा म पानी के सुवाद ह बदल जाथे – ओकर कुछ दुरिहा जाए ले बोली घलो बदल जाथे।
(थोड़े-थोड़े दूर में पानी का स्वाद बदल जाता है-उससे कुछ दूर जाने पर बोली बदल जाती है।)

2. ‘नींदे कोड़े खेती, कोरे गाँथे बेटी।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ- जउन प्रकार ले मुड़ी ल कोर गांथ के बेटी ह सुग्घर दिखथे। वइसने निदे कोड़े खेत हर मन ल मोह डारथे।
(जिस तरह कोर गाँथ के सजाई हुई बेटी सुन्दर लगती है। वैसे ही निदाई-कोड़ाई कर की गई खेती आकर्षक प्रतीत होती है। )

3. ‘धान, पान अउ केरा, ए तीनों पानी के चेला।
छत्तीसगढ़ी अर्थ- ये हाना के अर्थ हावय,धान अउ केरा के फसल ल पानी के सबले ज्यादा जरूरत होथे अउ ज्यादा पानी भरे म घलो धान अउ केरा के फसल ह खराब नई होवय फेर ‘पान’ बर ज्यादा पानी के जरूरत नई होये ले घलो हाना म ऐला शामिल करें गे हावय। येकर कुछ शब्द म अर्थ हे धान, पान अउ केरा तीनो पानी के शिष्य आय। पान के पत्ता ल अगर कपड़ा ल भिजो के अगर पान ल लपेट के रख देबो तभो ले वो सरय नई अउ आरूग रहिथे। येकर इहि गुन के सेती ये कहे जाथे की ,धान पान अउ केरा, ये तीनो पानी के चेला।

( यह हाना गूढ़ार्थ लिए हुए है। धान और केला की फसल को पानी की ज्यादा आवश्यकता होती है और ज्यादा पानी भर देने पर भी धान और केला की फसलें नष्ट नहीं होती। मगर ‘पान’ के लिए ज्यादा पानी की आवश्यकता न होने पर भी हाना में इसे शामिल किया गया है जिसका शाब्दिक अर्थ है-धान, पान और केला तीनों पानी के शिष्य हैं। पान के पत्ते को यदि भीगे हुए कपड़े में लपेटकर रख दिया जाय तो वह सड़ता नहीं बल्कि ताजा बना रहता है। उसके इसी गुण के कारण यह कहा गया है -धान पान अउ केरा, ये तीनो पानी के चेला।)

4. ‘जिहाँ चार बभन, तिहाँ परे लाँघन ।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ- जिहा चार झिन आने -आने गोठीयइया मत वाले विद्वान मन एके सँग हे त उहाँ बुता म गड़बड़ी जरूर पयदा होही ।
(जहाँ चार भिन्न-भिन्न मत वाले विद्वान एकत्र हो वहाँ काम मे गड़बड़ी अवश्य ही उत्पन्न होगा। )

5. ‘टलहा बनिया का करे, ए. कोठी के थान ल ओ कोठी म भरे ।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ- निठल्ला बिन काम काज के रहिथे।
(निठल्ला व्यक्ति अपने आपको व्यस्त दिखाने के लिए अनावश्यक कार्य करता रहता है।)

6. ‘चढ़ाय बहुरिया चिंगरी म झोर माँगे।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ- कोनो आदमी ल ज्यादा चढ़ाए ले ओ आनी बानी के मांगे ल धर लेथें। जइसे बहुत चिड़चिड़इया बहु ह,सुखाए चिंगरी मछरी साग के झोर( तरी ) मांग के बईठे रहिथे।
( किसी व्यक्ति को अधिक बढ़ावा देने पर वह अनाप- शनाय माँग करने लगता है। जैसे सिरचढ़ी बहुरिया, सूखी चिंगरी मछरी की सब्जी के झोर (तरी) की माँग कर बैठती हैं।)

7. ‘खाए के बेर भाई भतीज, जूझे के बेर देवर ससुर ।
छत्तीसगढ़ी अर्थ- सच म माईलोगिन मन ह अपन मइके के ही पक्ष लेथे। खाना खवाये के बेरा मइके वाले के अउ बुता के मामला म ससुरार वाले मन ल अहमियत देथे।
(स्त्रियाँ स्वभावतः माइके वालों का पक्ष लेती हैं। वे खाना खिलाने मैहर वालों का तथा काम लेने के मामले में ससुराल वालों को प्राथमिकता देती है।)

8. ‘दाइ मरै धिया बर, धिया मरै पिया बर ।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ – दाई अपन बेटी ल सुख म रखे बर अपन परान ले ज्यादा अपन बेटी के फिकर ल करथे फेर बेटी ह अपन मयारू के मया म भुला के सराबोर रहिथे।
(माँ अपनी बेटी को सुखी रखने के लिए प्राण- प्रण से जुटी रहती है मगर बेटी अपने पिया के ऊपर वारि रहती है )

9. ‘पाँड़े घर के बिलइया सियान।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ- बुता के करत ले ओकर बर भारी मया अउ बुता होये के बाद ओकर ले फिकर घलो नई करय जउन पाड़े घर के जइसन होथे।
(काम होते तक खुशामद करने और काम हो परवाह न करने वाले लोग रहते हैं जो पाँड़े घर की के समान होते हैं।)

10. ‘बिलइया सियान त मुसुवा बिल म मरे बिहान।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ- अगर बिलई बनही सियान त  मुसवा मन के होही  मरे बिहान, सुग्घर बिहनिया उकर मन बर कभू नई आवय।
(बिल्ली को मुखिया बना दिया जाय तो चुहे के बिल में हमेशा ‘मरे बिहान’ ही होता है, ‘सोनहा बिहान’ भी नहीं आता।)

11. ‘जोग माँ साख नहीं, आँखी म भभूत आँजे।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ – कुछु बुता करे के औकात नई हे अउ वो आदमी ह लफ लफ गोठ भर ल मारत हे।
( कुछ करने की औकात है नहीं, तो भी वह व्यक्ति बड़ी बड़ी हाँक रहा है।)

12. ‘धन धरावै तीन नाँव, परसू, परसोत्तम परशुराम
छत्तीसगढ़ी अर्थ- आदमी मन के आदर अउ सम्मान ह धन के अनुसार होथे। जब धन नई होवय त ‘परसु’ कहिथे फेर थोर बहुत धन आ जाथे त ‘परसोत्तम’ कहिथे अउ जब बहुत अकन धन आ जाथे तब ओला  ‘परसुराम’ कहिथे।
( मनुष्य का आदर धन के अनुसार ही होता है। जब धन नहीं होता तो लोग ‘परसू’ कहकर पुकारते हैं। जब कुछ धन हो जाता है तो ‘परसोत्तम’ कहते हैं और अधिक धन हो जाने पर वे ‘परशुराम’ कहलाने लगते हैं।)

13. ‘कभू काल के खाइस पान, दाँत निपोरिस गइस परान।‘
छत्तीसगढ़ी अर्थ- सड़े पान ल खाये ले जीव निकले के डर रहिथें।
(पुराने सड़े हुए पान को खाने से जान जाने का डर रहता है।)

14. ‘तेंदू के अंगरा बरे के न बुताय के।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ – तेंदू पेड़ के डारा ल बारे ले न तो वो बरय अउ न तो बुझावय मतलब चारो डहर सिर्फ धुवा ही धुवा बस रहिथे।
( तेंदू पेड़ के तने के लकड़ी को जलाने से न तो वह ठीकसे जलता है न ही बुझता है अर्थात् चारों ओर धुआँ-धुआँ रहता है)

15. ‘उधार के खवई अउ भुरी के तपई।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ- जउन प्रकार ले पयरा ल जलाए ले ओकर गर्मी के कुछ छिन के सुख मिलथे वइसने उधार लेके खाये के सुख घलो कुछ छिन तक रहिथे।
(जिस तरह पैरा को जलाने से उसकी गर्मी से क्षण भर ही सुख मिलता है वैसे ही उधारी लेकर खाने का सुख क्षणिक होता है।)

16 ‘चोरी करै तउन लात खाय, भूती करै तउन भात खाय।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ- चोरी करईया मन हमेशा लात ही खाते फेर कमइया आदमी मन अपन मेहनत के कमई ले सुग्घर दार भात खाते अउ सुख म रहिथे।
(चोरी करने वाला हमेशा लात ही खाता है जबकि श्रम करने वाला व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई से भात दाल खाता है और सुखी रहता है)

17. ‘घर के पिसान ला कुकुर खाय, परथन वर माँगे जाय।’
छत्तीसगढ़ी अर्थ – घर के खाये के चीज मन ल कुकुर ह खावत हे अउ दुसर ल खवाये बर हमन ओकर ले मांगे बर जावत हन।
(घर के खाने के चीजों को तो कुत्ता खा रहा है और दूसरों को खिलाने के लिए हम उसे माँगने जा रहे हैं।)

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