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//गनेस वंदना//
जय गणेस देवता, पहिली सुमरनी गावँव तोर।
गियान बुद्धि के देने वाला, हर ले संकट मोर।।
लंबा–लंबा सूंड हाबे अउ, पेट हे बड़ भारी।
सूपा जइसे कान हाबे तोर, मुसवा के सवारी।।
सब के मंगल करने वाला, लड्डू के खवइया।
पहिली पूजा तोर होथे, सिद्धि के देवइया।।
तोर दया से अंधरा देखे, गूंगा गाना गाथे।
लूला लंगड़ा कतको राहे, पहाड़ मा चढ़ जाथे।।
जेकर उपर तोर किरपा हे, कभू दुख नइ पावे।
भर जथे भंडार ओकर, रिद्धि सिद्धि घर आवे।।
हाथ जोड़ के विनती करत हँव, सब के भंडार भरबे।
माटी लिखत हे “माटी के काया” , सदा सहाय करबे।।
भूल चूक ल माफी देबे, अपरंपार तोर माया।
तोर चरन मा संउपत हाबो, माटी के काया।।
रचनाकार
महेंद्र देवांगन “माटी”
राजिम
जिला – गरियाबंद
छत्तीसगढ़