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पीका झन फूटय कभू, मन म मोर अभिमान के।
असीस पाववँ सबदिन दाई, छइँहा म रहँव सियान के।।
छाँट देबे तैं बन अउ करगा, बगरत कतको रोगराई ला।
चत्वारत सरलग रहिबे वो,मन पथरा म उपजत काई ला।।
:- बीजहा पोठ बनवँ दाई मैं, कोदो कुटकी धान के।
पीका झन फूटय कभू, मन म मोर अभिमान के।।
संसो करँव बूता बर सरलग, सुवारथ थोरको झन आए।
लाँघन पेट भरै अउ दुखिया,जुग-जुग असीस देवत जाए।।
:-हर जनम मोला देबे तैं, मैं बेटा बनँव किसान के।
पीका झन फूटय कभू, मन म मोर अभिमान के।।
अड़चन अलहन ले रखबे दुरिहा, सिरतोन साँच बर ठाढे़ राहँव।
मान बाढ़य सबरदिन सबके, मैं नेव कस पथरा माढ़े राहँव।।
:-ज्ञान गरब कभू होवै झन मोला, तैं रद्दा् धरादे सुजान के।
पीका झन फूटय कभू, मन म मोर अभिमान के।।