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हमर पितर अउ हमर कउँवा

पितर पाख ह कुँवार महीना के अंधियारी पाख के एक्कम तिथि ले लेके अमावस तक चलथे। पंदरा दिन तक घरोघर बरा, सोहारी, गुलगुला भजिया, खीर बनाके पुरखा मन ला गुड़ अउ घींव के हुम दे जाथे।

बताए हे की गुड़ अउ घी के हुम ला पितर पाथे। पितर पाख मा तो अबड़ नियम–धियम रहिथे, फेर आज कल के वातावरण अउ व्यस्थता ला चलते धीरे–धीरे बदलत जात हे; अउ कम होवत हे। पर पितर ह सिरिफ बरा, सोहारी राँध–राँध के खाय बर नइ मनाये जाए; भलुक येमा मनखे के संग–संग हमर पर्यावरण अउ पशु–पक्षी घलो जुड़े रहिथे। आजकल मनखे मन हा सोचथे की पितर ल नइ मनाबो त का हो जाही।

नहीं…. नहीं…..। येकर नइ मनई हर हमर पर्यावरण अउ पशु–पक्षी के विनाश के कारण घलो बन सकत हे।

हमर सियान मन बोलय की हुम देये के बाद रोटी–पीठा ल छानही म फेंक देहू। कउँवा मन आहीं अउ खाहीं त समझ लेहू की पितर मन आ के खावत हें, त घर म जेन नान–नान लोग–लइका रहय तेन मन हर बबा–दाई मन के मजाक उड़ावँय; कइसे बोलथस बबा….! मरगे तेन मन कोनों कोउँवा बन के आहीं गा……।

पर ….. हमर पुरखा मन घलो जेन काम करे अउ बताये ते सोला आना सच रहय, भले हमन बात ल हँसी–मजाक म टाल देतव रहेन।

अइसे घलो माने जाथे कि त्रेतायुग म भगवान इंद्र के बेटा ह सबले पहिली कउँवा के रूप धरे रिहिस, अउ जयंत ह माता सीता के तीर म जा के ओकर पाँव म चोंच मार दिस। उही बेरा भगवान श्रीराम जी ह तिनका बाण चला के जयंत के आँखी ल फोर दिस। जयंत ह रोवत-गिड़गिड़ावत भगवान राम जी ले माफी मांगिस, उही बेरा राम जी अपन दयालु स्वभाव ले माफ करके जयंत ल वरदान दिस कि तोला पितर पाख म परसे खाना ह मिलही अउ पितर के रूप माने जाही।

कउँवा ह प्राकृतिक कारण ले नइ मरे, भलुक कोनो मार दिही या बीमारी ले ही मरथे, काबर की समुद्र मंथन के बेरा म कउँवा अमृत पीये रिहिस; अइसे बताए हे।

वइसे हमर पुरखा मन प्रकृति ले बहुते-जादा जुड़े रिहिन हें। रुखराई, चिरई–चिरगुन ले बड़ मया करें। पर्यावरण ल सजा के राखें।

कउँवा मन ल खाये बर देये के ये कारण घलो बताए हे कि भादो महीना म मादा कउँवा मन अंडा दे थे। अपन लइका ल छोड़के जादा दुरिहा नइ जा सकय, ते पाय के घरोघर के छानही या बरेंडी म जा-जाके दाना–पानी के बेवस्था कर पाथे, पर अब दिनों-दिन कउँवा के संख्या कम होवत हे।

एकठन बात जनई जरूरी हे कि कउँवा मन ह पीपर अउ बर के बीजा ल खाथें; ओ मन ह ये बीजा ल खा के कोनों जगह बीट कर देथें, जेकर ले बर अउ पीपर के पौधा जगह–जगह जाग जाथे। येकर ले हमर वातावरण शुद्ध होथे।

आजकल कउँवा ल बचई बहुत जरूरी हे। येकर जनसंख्या बहुत कम होगे हे। देखे बर नइ मिले। बरगद–पीपर के रूख म आक्सीजन के मात्रा बहुत अधिक पाए जाथे ; ते पाय के पर्यावरण ल सरेखे बर पुरखा मन ये उपाय ल करे हें।

पितर मा तोरई तरकारी के अब्बड़ महत्व हे। तोरई के साग अउ ओकर पत्ता के अब्ब्ड़ महत्व बताये हे। येकर बिना पुरखा मन नइ तरँय। तोरई के अर्थ ही तारना हे। तोरई के साग अउ ओकर पत्ता म रख के परसे जाथे। मोर मयारू संगवारी हो….!

ये कहानी नो हरय; सही बात आय। हमर पुरखा मन बताए बात ल माने बर हमन पाछू नइ घुँच सकन। अब्बड़ सोच–बिचार करके पुरखा मन हर बात ल रखे हें। हमन ल पर्यावरण के सुरक्षा करई घलोक बहुत जरूरी हे। आप जम्मों झन ले मोर हाथ जोड़ के बिनती हे की ये हमर पुरखा मन के माना ल बनाए राखहू। जय जोहार….!


लेखिका
प्रिया देवांगन “प्रियू”
राजिम
जिला – गरियाबंद
छत्तीसगढ़

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