हमर धान के सधौरी | सुधा वर्मा
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हमर धान के सधौरी

सधौरी तो नारी मन के होथे। धान के सधौरी कइसे हो सकथे। सधौरी होथे, हमन तो पूरा प्रकृति के मानवीकरण कर ले हन। धरती मां आये। देश मां आये, छतीसगढ़ मां आये। पेड़ पौधा ल राखी बांध के भाई वनाथन। नर्मदा अठ गंगा नदी मां आये। तब हम धान के सधौरी कावर नइ मना सकन धान याने लक्ष्मी माता। अन महतारी।
ये महतारी पोठियाथे वाने ओमा दूध भराथे ये ह चावल बने के प्रक्रिया आये। ये प्रक्रिया ल किसान ह खुशी म पोठियाना तो कहिये ही फेर एक दिन ओखर पूजा करके खुशी मनाथे। ये दिन होथे पोला के दिन। ये दिन ल नंदी के जन्मदिन के रूप में भी मनाये जाथे। भादों के अमावस्या के दिन ये तिहार ल मनाये जाथे। रोटी पीठा तो वनवे करथे. छत्तीसगढ़ के खास ठेठरी अउ खुरमी बनाये जाये। नंदी के पूजा करे जाथे। गुरहा चीला बोबरा बना के खेत में जाके पोठियाये धान के पूजा कर परसाद वाटयें अठ पर आथे।
दूसर डाहर खेती के काम सिरा जये त बैल मन ल नहवा धोवा के बने हाथ गोड़ के मालिश करके रंग बिरंगा सजायें। सिंगल कौड़ी ले सजाये, गला म माला पहिरायें। नंदी के बने सिंगार होथे ओखरो सिंग ल सजायें हाथ गोड़ म रंगीन छापा बनाके ओखर पीठ ल कौड़ी ले सजे कपड़ा ले तोप देथे। एक टन याजा धन के बजावत घर घर जा के नंदी के दर्शन करायें। शेखर जाइसे मन वइसे दान में कुछ न कुछ देखें। आज पशु पालन समाप्ति के कगार में हावय व ये नांदिया है नंदा गे हावय। आधुनिकीकरण के कारण ट्रेक्टर के आये ले हमर मवेशी मन अब बेकार होवत जात हावय। तब सब जानवर पालना ही बंद कर दे हावय। अब तो गाँव गाँव में पैकेट के देव मिलत हावय। अब तो यादव मन भी अपन धंधा ल छोड़त हावय। तब गांव में भी चरवाहा नड़ मिलत है।ऐ सब कारण हावय पशुपालन। नंदाये के जब पशु ही नइये तब नंदी कहां ले आही। बाइला के दौड़ होक्य तेनों अब बहुत कम जगह म होथे। बइला दौड़ के बड़े-बड़े प्रतियोगिता होवय। दर्शक राहय अब तो कुछ भी देखे बर नइ मिलय ।
ये माटी के बड़ला के जोड़ी के पूजा होथे। लड़की मन बर माटी के खिलौना खरीदथें अउ ओ मन ल गृहस्थी के प्रशिक्षण देय वर ये सब काम आथे। एक ही दिन बहुत तरह के खेल होथे। ये खिलौना के पूजा करे जाथे। हल्दी पानी छिड़क जाये । ठेठरी खुरमी चढ़ाये जाथे। ओखर बाद बेटी मन माटी के खिलौना खेल, बेटा मन माटी के बड़ला ल गली खोर म दऊंड़ायें। सांझ के पोरा पटके जाथे। पोरा न ठेठरी खुमी रख के गांव के बाहिर माई लोगन मन जा के पोरा पटकथें। अब खेत म जानवर के उपयोग नई होवय त ओमन आराम करथे। सब अपन तीज तिहार मनाये म लग जथे।
तीजा म बेटी मन ल लाये वर इही पोरा के कलेवा ल धर के जायें। पोरा तिहार के बाद बेटी माई मन तीजा माने पर अपन मड़के चल देवें। धान के खेत अब लहलहाये ले लग गये ओला अब एक बेर पानी के जरुरत होथे धान ल पके वर। गर्भधारण करे धान के बाली खुशी-खुशी लहलहाये ये बाली के बाढ़ आकार। ल देख के किसान खुश होथे।
लेखिका: सुधा वर्मा

(साभार- देशबंधु मड़ई म प्रकाशित)

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