जोहार
हमर छत्तीसगढ़ के पहली तिहार “हरेली” के आप सब्बो संगवारी मन ला गाड़ा गाड़ा बधाई।
आज लेे हमर कृषि बछर के सुरूवात ह होगे हे। हमर जम्मो किसनहा भाई मन के ए पईत फसल ह बड़ पोक्खा पोक्खा होवय अउ संगे संग सबों कोती खुशहाली आय।
आप जम्मो संगवारी मन के आगू म पठोवत छत्तीसगढ़ के पहली तिहार “हरेली” से जुरे छोटकन(थोकिन) जानकारी हमर यूट्यूब चैनल माटी के मया के माध्यम ले।।
वइसे तो हरेली के सुरुवात ह सावन के लगते ही हो जथे, काबर की सावन महीना के लगते ही भगवान तिहार(सवनाही) मनाय के हमर बिसेस परंपरा हे, जेमा घर के बाहिर के पर्दा म गोबर ले अलग अलग चित्र बनाय जाथे। फेर हरेली मनाय जाथे सावन के अमावस्या के दिन।
हरेली ह मनखे अउ भुइयां के सुग्घर लइका महतारी मया के परिचायक घलो आय। कहे जाथे आज के दिन हमर फ़सल म दूध (रस) भरथे, इही सेती आज के दिन कोनो भी परकार के खेती,किसानी के बुता नई करे जाय।
हरेली के आत ले सबो किसानी के बुता झर जाय रथे, तेकरे सेती किसानी जूरे औजार (नागर, रापा, कुदारी, बउसला-बिधना, हसिया आदि)ल सुग्घर धो मांज के, चउक पूरे आसन म रख के पूजा बर रखे जाथे। घर के जतका भी पशुधन हे(गाय, बइला, भइसा आदि ल) तरिया, नदिया या जउन भी साधन ले हो नहवा धोवाके सुग्घर सजाय जाथे। ओकर बाद औजार अउ पशुधन के आरती थारी सजाके पूजा पाठ करे जाथे, जेमा चीला रोटी के परसाद(भोग) चढ़ाय जाथे,संग म गाय गरवा मन ल गहूं पिसान के लोंदी म नून डार के खवाय जाथे।
आज के दिन गेड़ी बनाय के घलो बिसेस मान्यता हे।वइसे तो ए परब म गेंड़ी काबर बनाए जाथे, एकर ए परब ले संबंधित का महत्व हे, ए बात कोनो ठोस कारण नइ मालूम होवय,अउ ते अउ एकर कोनो आध्यात्मिक कारण घलो समझ म नइ आवय। फेर चेतलग सियान मन के कहना हे, एला चम्मास के गहीर बरसा के सेती किचिर-काचर माते चिखला ले लइका मनला बचा के रेंगाए खातिर बनाए गे होही. तेमा वोमन चिखला-पानी ल नाहकत घलो स्कूल, कोनो तरिया या अपन संगी-साथी मन संग मेल-भेंट करे बर आसानी के साथ जा सकय. एकरे सेती ए हरेली परब के बहाना गेंड़ी बनाए के नेंग ल घलो कर दिए जाथे।
“”खेती किसानी संग मंत्र जगाए के परब हरेली”…(कवि सुशील भोले जी के मत ले….)
छत्तीसगढ़ राज के जतका मूल परब-तिहार हे, सबके संबंध कोनो न कोनो रूप ले अध्यात्म संग जरूर हे। ए बात अलग आय के आज हम उंकर मूल कारण ल भूलागे हावन, तेकर सेती प्रकृति या खेती-किसानी संग जोड़ के वोला कृषि संस्कृति के रूप म बताए अउ जाने लगथन।
इहां के संस्कृति म सावन महीना के पहला परब “हरेली” के संग घलो अइसनेच बात हे। ए दिन जम्मो किसान अपन नांगर- बक्खर संग आने जम्मो कृषि यंत्र के धो-मांज के पूजा करथें। एकरे सेती एकर चिन्हारी ल कृषि पर्व के रूप म बताए जाथे। फेर एकर आध्यात्मिक पक्ष के अनदेखा कर देथें।
आप सबो झन जानथौ के इही दिन या एकर आगू रतिहा जम्मो गाँव मन म गाँव बनाए के परंपरा ल घलो पूरा करे जाथे। इहाँ के ग्रामीण संस्कृति म “बइगा” कहे जाने वाला “मांत्रिक” मन इही दिन अपन-अपन मंत्र के पुनर्पाठ करथें। माने साल भर म वोला फिर से जागृत करथें। कतकों झन मन इही दिन मांत्रिक गुरु अउ शिष्य घलो बनाथें। गुरु शिष्य के रूप म परब मनाथें।
इहाँ ए बात जाने के लाइक हे, के सावन महीना के इही अमावस के दिन महादेव ह मांत्रिक शक्ति के उदगार या प्रकट करे हें। अइसे लोकमान्यता हे के, उन अपन त्रिशूल म बंधाए सिंघिन ल फूंक के मंत्र मन के उद्घोष करे हें, उनला प्रगट करे रिहिन हें। अब ये कतका सही अउ कतका कल्पना के बात आय, एला तो उहिच ह जानय, फेर ए बात सोला आना सच आय, के हरेली परब के संबंध अध्यात्म संग जरूर हे। मंत्र के माध्यम ले लोकहित के भावना घलो साक्षात नजर आथे. हमर इहाँ ए दिन गाँव के लोहार समाज के मन अपन-अपन मालिक घर जाथें अउ उंकर घर के चौखट म खीला ठेंसथें. अइसने बइगा मन घर के दुआर मन लीम पाना खोंचथें. इही किसम घर के माई दरवाजा के संगे-संग कोठा आदि म गोबर के पुतरीनुमा जेन छापा बनाए जाथे, सबके भाव संबंधित घर के हर प्रकार के रोग राई अउ बाहरी बाधा आदि ले सुरक्षा के ही भाव रहिथे.
आज के दिन ल गाँव के पहाटिया समाज के मन अड़बड़ नियम ले मानथें।तिहार के आगू दिन भिनसरहा लेे बने नहा-धो के जंगल जाथें अउ मवेशी मन बर जड़ी-बूटी खोज के लाथें। रातभर जाग के कांदा–कुसा ला उसनथें। उसने के बेरा रात भर पहरा देथें, के काहीं जीव जंतु वोमा झन खुसर जाए । साथ में टोटका घलो करथें। ये काम ला पुरुष मन करथें. अपन देव धामी के पूजा करथें, सहड़ा देवता म चढ़ाथें । घर के मुहाटी म लीम के डारा ला खोचथें ।
जोहार छत्तीसगढ़ 🙏🙏🙏🙏
संकलन:-
लोकेश कुमार सेन।।
youtube – माटी के मया
bachhar
18/07/2023bahut sundar lokehsh bhai