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गीता मे हृदयं पार्थ गीता मे सारमुत्तमम्।
गीता मे ज्ञानमत्युग्रं गीता मे ज्ञानमव्ययम्।।
गीता मे चोत्तमं स्थानं गीता मे मरमं पदम्।
गीता मे परमं गुह्यं गीता मे परमो गुरू:।।
गीता मोर हृदय हरय। गीता मोर उत्तम सार हरय। गीता मोर अति उग्र ज्ञान हरय। गीता मोर अविनासी ज्ञान हरय। गीता मोर सबले सुघ्घर घरौंदा हरय। गीता मोर परम पद हरय। गीता मोर परम रहस हरय। गीता मोर परम गुरू हरय।
” भगवान श्री कृष्ण जी”
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रविस्तरै:।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि:सृता।।
जेन खुद श्री विष्णु भगवान के मुख कमल ले निकले हावय, ये गीता ला सुग्घर ढंग ले कण्ठस्थ करना चाही। आने शास्त्र के बिस्तार करे ले का फायदा?
“महर्षि व्यास जी”
गेयं गीता नाम सहस्रं ध्येयं श्रीपतिरूपमजस्रम्।
नेयं सज्जनसंगे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम्।।