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मनखे वो दिन मर जाथे

जब ईमान वोकर सर जाथे।

गरीबमन ले कांटा मारथे।

लूट-खसोट से घर सारथे।

ईमानदारी के रद्दा भुला के,

टेबुल तरी रिस्वत ओगारथे।

मनखे वो दिन मर जाथे

जब वोकरजुबान सर जाथे।

गुरतुर बोली ल टार डारथे।

करु-कस्सा ल धर डारथे।

पर-अपन के चिन्हारी भूल

दुक के बीजा बो पारथे।

मनखे वो दिन मर जाथे

जब झगरहा रूप धर डारथे।

हली-भली ल छोड़ के,

मेल-जोल ल तोड़ के,

हरहर-कटकट म पर जाथे।

गोठ के गठरी नता बिगारथे।

मनखे वो दिन मर जाथे,

जब मतवार रूप धर डारथे।

चाल चरित्तर माटी मिला के,

घर-परिवार के ने हिला के,

धमना कस ऐती-वोती किंदर

जीवन के सुक गंवा डारथे।

मनखे वो दिन मर जाथे

जब हिंसक रूप धर डारथे।

जी-जंतु से पियार भुलाके,

कमजोरहामन ल रोवाके।

चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’ – जांजगीर-चांपा

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