2 min read
229 words
4 views
मनखे वो दिन मर जाथे
जब ईमान वोकर सर जाथे।
गरीबमन ले कांटा मारथे।
लूट-खसोट से घर सारथे।
ईमानदारी के रद्दा भुला के,
टेबुल तरी रिस्वत ओगारथे।
मनखे वो दिन मर जाथे
जब वोकरजुबान सर जाथे।
गुरतुर बोली ल टार डारथे।
करु-कस्सा ल धर डारथे।
पर-अपन के चिन्हारी भूल
दुक के बीजा बो पारथे।
मनखे वो दिन मर जाथे
जब झगरहा रूप धर डारथे।
हली-भली ल छोड़ के,
मेल-जोल ल तोड़ के,
हरहर-कटकट म पर जाथे।
गोठ के गठरी नता बिगारथे।
मनखे वो दिन मर जाथे,
जब मतवार रूप धर डारथे।
चाल चरित्तर माटी मिला के,
घर-परिवार के ने हिला के,
धमना कस ऐती-वोती किंदर
जीवन के सुक गंवा डारथे।
मनखे वो दिन मर जाथे
जब हिंसक रूप धर डारथे।
जी-जंतु से पियार भुलाके,
कमजोरहामन ल रोवाके।
चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’ – जांजगीर-चांपा