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आखर आखर तोर सबद सिरजथे।
सबद के सिरजन ले भाखा उबजथे। ।।2।।
तहिं भाखा वो दाई हमर चिनहारी।
तोला गोहरावयँ लइका पारत किलकारी
जय हो छत्तीसगढ़ी भाखा महतारी ।।2।।
1.-
दाई के अँचरा भीतर पीके गोरस।
पायेंन दाई सहज तोला सरबस।
कुहकी हुंकारु पारेन बाप के बंइहा
बूढ़ी दाई बबा संग गजब इठलइया
जीभ तोतरावत बोली लागय निक भारी
इही मीठ बोली ले बनथें संगी संगवारी
जय हो छत्तीसगढ़ी भाखा महतारी।।2।।
2-
समरिद्धि ले सहस पाँव आगर
ऊँच हे महिमा अथाह गुन सागर
गुरतुर लागे ठिठोली गोठ बानी
तोर इही भाखा ले होगे कतको ग्यानी
मन हुलसावय तोर ले उलहे जिनगानी
सतरंगी चमके जइसे सीत के पानी
जय हो छत्तीसगढ़ी भाखा महतारी ।।2।।
3-
पढ़ लिख तोला ये जिनगी सजाबो
किरिया हे जस ल जिंयत बगराबो
तोर संग नता हे जनम अउ मरन ले
करम तंहिच हा तोरेच ले धरम हे
तुंही ल सजावन कंठ म फभय सिंगारी
महतारी मान बढ़ाबोन गाबोन महतारी
जय हो छत्तीसगढ़ी भाखा महतारी।।2।।
स्वर : ईश्वर साहू बंधी अउ वसुन्धारी ध्रुव
गीत : ईश्वर साहू बंधी
संगीत: राधे श्याम साहू अउ ईश्वर सोनबेर