पीका झन फूटय कभू, मन म मोर अभिमान के। असीस पाववँ सबदिन दाई, छइँहा म रहँव सियान के।।
पीका झन फूटय कभू, मन म मोर अभिमान के। असीस पाववँ सबदिन दाई, छइँहा म रहँव सियान के।। छाँट देबे तैं बन अउ करगा, बगरत कतको रोगराई ला। चत्वारत सरलग रहिबे वो,मन पथरा म उपजत काई ला।। :- बीजहा पोठ बनवँ दाई मैं, कोदो कुटकी धान के। पीका झन फूटय कभू, मन म मोर अभिमानRead More